इतनी गहरी जमा रखी हों जहां एक वोट से पूरी सरकार हिल जाए वहाँ करीब २५ करोड़ के इतने बड़े तबके को नज़रंदाज़ करने का मतलब अपनी जड़ों को हिला देना है.मुसलमान आजादी के बाद ही से एक वोट बैंक की शक्ल में इस्तेमाल होते आये हैं और हिन्दोस्तान की सबसे बड़ी पार्टी जिसने सबसे ज्यादा वक़्त तक हुकूमत की है उसने भी हमेशा मुसलमानों को जज्बाती मुद्दों में उलझा कर रखा.कभी इस्लाम खतरे में है तो कभी उर्दू ज़बान खतरे में है का नारा लगा कर मुसलमानों को हमेशा जज़्बात में उलझाए रखा जिसका नतीजा ये हुआ की ये कौम दूसरी कौमो के मुकाबले बहुत पीछे रह गयी.इसका अहसास मुसलमानों को उस वक़्त हुआ जब गुर्जर समाज ने अपने हुकूक लेने के लिए मेहनत की औए उसके बाद कांग्रेस की मरकजी हुकूमत ने मुसलमानों को एक बार फिर बहलाने के नाम पर सच्चर कमिटी और रंगनाथ मिश्र कमिटी की रिपोर्ट को संसद में पेश किया जिसमे मुसलमानों की हालत दलितों से भी गयी गुज़री बतायी गयी और उन्हें दस प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की गयी. बस फिर क्या था एक बार फिर मौका मिल गया सियासतदानो को मुसलमानों पर राजनीति करने का और मुसलमान भी उनके प्रभाव में आकर आरक्षण लेने का दमखम दिखाने को तैयार हो गए.